Friday, January 2, 2015

किसान की रजामंदी के बिना होगा भूमि अधिग्रहण....!!क्या चाहते हैं नरेंद्र मोदी जी ऐसा कानून बनबाकर ??आदिवासियों को भूमि हड़पने और अपने ही घर से बेदखल होने का और डर सताए , पूरा आदिवासी समाज या खेती पर निर्भर रहने वाले परिवार,बेचारे सिसकें, रोएँ और कहें की इससे अच्छा तो हम गुलाम ही सही थे..!! नक्सलाइट को और बढ़ावा मिले??साहब !!उन ग्रामों को जिन्हे आप विकास के नाम पर आधुनिक बनाना चाहते हैं,क्या उसके निवासियों को आप इतना भी हक़ नहीं देना चाहते ?? की जब विकास की बात आये और उनके खेत सरकार द्वारा कब्जाए जाएँ तो ग्रामों के हलधर अपनी बात भी कह सकें,थोड़ा मनमाफिक मुआवजा भी मांग सकें..!!
 कभी चाय की दुकान पर काम करने वाले भारत के प्रधानमंत्री जी, क्या आपको यह अनुभव नहीं प्राप्त है?? की टूटे छप्पर और फूटे बर्तन के घर का मालिक जब अपने मासूमो की भूख शांत करने के लिए सड़क पर चाय की गुमटी लगाता है,और एकदिन एकाएक बिना कोई वैकल्पिक व्यवसाय दिए, विकास के नाम पर शहर की मोटरें लाठी सहित आतीं है,गुमटी तोड़ती हैं तो उस मासूम पिता पर क्या बीतती है??.शायद आपको अनुभव नहीं मिल पाया हो आप स्टेशन पर जो काम करते रहें हैं..पर सबने देखा है उस टूटे छप्पर के घर में झांक कर की उस दिन घर में छोटे बच्चे सिर्फ तड़पते हैं भूख से, घर में चूल्हा नहीं जलता है बहुत दिनों तक.....!!
तो फिर उस पर क्या बीतेगी जो अपनी एकमात्र संपत्ति को सरकार के हाथों लूटते देखेगा क्या आपका नियम लोकतंत्र की हत्या नहीं करेगा... अरे,,कुछ अधिकार गरीबों के पास भी रहने दो, सरकार कभी तो उनके दरवाजे तक कुछ आदेश लेने जाये..!! राष्ट्रवाद के साथ मानवीय संवेदनाओ का जिन्दा रहना भी जरुरी है वर्ना विकास की जगह अन्याय होने लगता है पिछड़ी आबादी के साथ...!!

Monday, December 29, 2014

अब चूंकि इस परंपरा का जोर है कि सत्ता का सुख आपकी गुणवत्ता पर नहीं बल्कि आपकी सजातीय संख्या पर निर्भर करता है,तो शातिरों के द्वारा धर्म के साथ छेडछाड प्रमुख मुद्दा रहेगा ही, चाहे वह जिन्ना हों या आज के आजम या ईसाई मिशनरियाँ या फिर खुद को हिन्दूओ का संरक्षक बताकर हिन्दूओ की ही लड़कियों पर भद्दी टिप्पणी करने वाले हिन्दू संगठनो के सदस्य हों॥ 
हमें कुछ ज्यादा नहीं बस इस परंपरा को ही बदलना होगा आखिर औवेशी से लेकर तोगडिया तक को जनाधार भी तो हम ही देते हैं।। भारत का विकास सिर्फ भारतीय कर सकते हैं धर्म के कुत्सित ठेकादार नहीं।स्पष्ट है आज राजनैतिक क्रांति की नही सामाजिक क्रांति की ज्यादा आवश्यकता है॥

धर्म की राजनीति सिर्फ संघ और उसके अनुसांगिक संघठन ही नहीं करते,बल्कि ईसाई और मुस्लिम के स्वघोषित ठेकेदार भी करते हैं...और ये ठेकेदार भी उसी तरह कुटिल और सस्ती लोकप्रियता के भूखे हैं जैसे अन्य कलयुगी मसीहा दिखते हैं..यदि एक वर्ग धर्म के नाम पर सरकार बनाना चाहता है, तो दूसरा वर्ग धर्म के नाम पर, सरकार में अपनी हिस्सेदारी चाहता है. दोनों के नेता प्रयास करते है युवाओं को बरगलाकर अपना सिपाही बनाने का,यदि एक तरफ तोगड़िया हैं तो दूसरी तरफ ओवेशी हैं..और यह कुछ नया नहीं है इससे पहले भी इतिहास में कई ओवेशी आये और गए पर रहे वही ढाक के तीन पात,क्योंकि बिना आपसी सद्भाव के विकास का सपना बेईमानी है..!!
"कर्म से राष्ट्रभक्त बनो और ह्रदय से मानवतावादी"अक्षय भट्ट

Wednesday, November 13, 2013

Interview of IPS Mr Prabhakar Chaudhary


Sunday, November 10, 2013

ये सपना आप भी देखिए !


सुबह उठा तो देखा कि भारत विकसित हो गया है । कल्लू दो रुपये प्रति पैमाना की दर से शैम्पेन वितरित कर रहा है फिर भी कोई भरपेट नहीँ निगल रहा है । युवक और युवतियाँ न्यूनतम परिधानोँ मेँ बड़े सलीके से शैम्पेन का लुफ्त उठा रहे हैँ । कोई किसी को घूर घूर कर देख नहीँ रहा है । ''जिया कुनैन रिजवी का खाली समय का सदुपयोग'' नामक व्याख्यान उटकमण्ड से सीधे टीवी पर प्रसारित हो रहा है । मेरे पूज्य पितामह के चौथे विवाह का जश्न चल रहा है और भावी पितामही अपनी आठवीँ शादी मेँ भी कयामत ढ़ा रही हैँ ।

भारतीयोँ द्वारा ब्रिटिश मजदूरोँ का शोषण आज भी एक वैश्विक मुद्दा बना हुआ है । भारतीय प्रधानमँत्री द्वारा अमेरिकी गरीबी और भूखमरी के अनुदान मेँ कटौती की सर्वत्र निँदा हो रही है ।
बच्चेँ महान अर्थशास्त्री लालू प्रसाद के ''तृण से ऊऋण'' के सिध्दाँत के विश्लेषण मेँ मग्न हैँ ।
रेलवे स्टेशन पर लोग केला और मूँगफली के छिलके नियत स्थान पर ही फेँक रहे हैँ । मूत्रालय और शौचालय का सही उपयोग करना लोग सीख गये हैँ । अब वहाँ भित्ति चित्र और भित्त आलेख का पूर्ण अभाव है । लोग न्यूतम वस्तुओँ के साथ यात्रा कर रहेँ ।
टैट सर अपनी ग्यारहोँ अँगुलियाँ फेस बुक के यज्ञ मेँ आहुति कर दिये हैँ तो शुक्ला सर अब अननोन लड़कियोँ को फ्रेण्ड रिक्वेस्ट भेजना बन्द कर दिये हैँ और सबसे बड़ी बात जिन्ना सर अब मेरा शहर राँची नामक पेज को अपडेट करना बन्द कर दिये हैँ ।
सरकार के ''अब न्यूनतम मेहनत करो'' नामक विधेयक का लोग विरोध कर रहेँ हैँ । कर्त्तव्यनिष्ठता सूचकाँक चौर सौ प्रतिशत तक बढ़ा हुआ है ।

अभूतपूर्व स्वतँत्रता संग्रामी सेनानी मुलायम सिँह की पुस्तक ''साम्प्रदायिक सौहार्द शिखर से शून्य की ओर'' को नोबुल समादृत किया गया है और प्रधानमँत्री मनमोहन को टाइम मैगजीन ने लगातार दसवेँ साल दुनिया का सबसे ताकतवर व्यक्ति घोषित किया । अखिलेश , राहुल और दिग्यविजय तीनोँ व्यावहारिक ज्ञान की पाठशाला मेँ प्रवेश ले चुके हैँ ।

संयुक्त राष्ट्र संघ ने महान समाज सेवक आशाराम को महिला और बाल विकास का ब्राण्ड अम्बेस्डर बना दिया है ।

महारानी सोनिया ने अपने 21वेँ जन्मदिन पर आस्ट्रेलिया को काँगेस से मुक्त करने की घोषणा की ।
भारत के सभी राज्योँ को समलैँगिक विवाह को मँजूरी मिली ।
जनसंख्या वृध्दि दर ऋणात्मक हो गयी है और सरकार ''अधिक बच्चे उपजाओ और लैपटाप मुफ़्त पाओ'' नामक अभियान चला रही है ।
जातिवाद , क्षेत्रवाद और साम्प्रदायिकता खोजने पर भी नहीँ मिल रही है । संयुक्त राष्ट्र संघ मेँ हिन्दी को वैश्विक भाषा और रुपये को वैश्विक मुद्रा का दर्जा मिल गया है ।

अतीक अहमद भारोत्तोलन मेँ स्वर्ण तो मुख्तार भाई ने निशानेबाजी मेँ तीन स्वर्ण लपक कर देश का गौरव बढ़ाया । मिस यूनिवर्स का ताज भारत सुन्दरी मायावती कृशाँगी को मिला ।
बाबा रामदेव ने हँसना बन्द कर दिया । आयोग परीक्षा की आयुसीमा चालीस से घटा कर साठ कर दिया है और प्रश्नपत्र मेँ नये प्रश्नोँ का भरमार है । विपिन सर के प्रतिभा का आयोग ने लोहा मान ही लिया और उन्हे लौह प्रतियोगी के सम्मान से नवाजा है अब वे शायद परीक्षा न दे । खुशी के इस क्षण मेँ विपिन सर ने एस आर वाई सर को चार बीड़ा पान और किताब कभी न खोलने की शपथ भी दिलायी है ।

मै आज चार नौकरियोँ के लिए त्यागपत्र लिख रहा हूँ । बगल वाले कमरे मेँ लैपटाप पर कुछ अजीब चीखने चिल्लाने की आवाज आ रही है शायद दँगे पर बनी कोई फिल्म बच्चे देख रहेँ हैँ ।
अरे ये क्या ? पछवाड़े पर एक जोरदार लात । साले गदहा बेँच कर सो रहे हो । नीँद खुल गयी । पिता जी के हाथोँ मेँ अखबार और आर ओ परीक्षा रद्द मुख्य समाचार ।

- (ए एन झा छात्रावास में मेरे सहपाठी अजय कुमार झा के फेसबुक वॉल से साभार)

Saturday, December 6, 2008

बारिश की बूंदें


- धनंजय मिश्रा

पत्तियों से लटकी बारिश की बूंदें
और उन पर पड़ती बल्ब की रोशनी रंगीन
नियति और पुरुषार्थ का संगम
प्रकृति और कृत्रिमता का संगम
सुंदर लगते हैं....
प्यारे लगते हैं...
पर डर लगता है
कहीं ये कृत्रिमता प्रकृति पर
और ये पुरुषार्थ नियति पर
हावी ना हो जाए...
कहीं रोशनी के भार से
बारिश की बूदें गिर ना जाएं....

ग़मज़दा हैं ज़िंदगी से...

पेश हैं अजय शुक्ला 'जुल्मी' की दो ग़ज़लें
१.

तंग आ चुके हैं कस-म-कस -ऐ जिन्दगी से हम
ठुकरा न दें इस जहाँ को कहीं बेदिली से हम

लो आज हमने तोड़ लिया रिश्ता-ऐ- उम्मीद
लो अब गिला न करेंगे किसी से हम


एक बार उभारेंगे अभी दिल के वल- वले
गो दब गए हैं भर-ऐ-गम-ऐ-जिन्दगी से हम

गर जिन्दगी में मिल गए फिर इत्तफाक से
पूछेंगे अपना हाल तेरी बेबसी से हम


हम गम-जदा हैं लायें कहाँ से खुशी के गीत
देंगे वही जो पायेंगे इस जिन्दगी से हम ...

२-
आज एक बार सबसे मुस्करा के बात करो
बिताये हुये पलों को साथ साथ याद करो
क्या पता कल चेहरे को मुस्कुराना
और दिमाग को पुराने पल याद हो ना हो

आज एक बार फ़िर पुरानी बातो मे खो जाओ
आज एक बार फ़िर पुरानी यादो मे डूब जाओ
क्या पता कल ये बाते
और ये यादें हो ना हो

आज एक बार मन्दिर हो आओ
पूजा कर के प्रसाद भी चढाओ
क्या पता कल के कलयुग मे
भगवान पर लोगों की श्रद्धा हो ना हो

बारीश मे आज खुब भीगो
झुम झुम के बचपन की तरह नाचो
क्या पता बीते हुये बचपन की तरह
कल ये बारीश भी हो ना हो

आज हर काम खूब दिल लगा कर करो
उसे तय समय से पहले पुरा करो
क्या पता आज की तरह
कल बाजुओं मे ताकत हो ना हो

आज एक बार चैन की नींद सो जाओ
आज कोई अच्छा सा सपना भी देखो
क्या पता कल जिन्दगी मे चैन
और आखों मे कोई सपना हो ना हो

क्या पता
कल हो ना हो ....

Saturday, July 5, 2008

घर से दूर...बहुत दूर...!










मैं कदम पर कदम बढ़ाता रहा और,
पीछे छूटते मील के पत्थरों की कतारों ने
नहीं होने दिया ये महसूस कि-
घर से बहुत दूर निकल आया हूं,

यहां नई दुनिया के नए लोग हैं जो,
शहर के बीचोबीच सवाल करते हैं कि-
'तुम यहां तक पहुंचे कैसे?'

क्या कहूं?
कहां से दूं जवाब?
जवाब तो मैं छोड़ आया था
अपने घर पर उसी वक्त,
जब मैंने आते समय मां का पैर छुआ था...!

Thursday, June 19, 2008

राजू बेट्टा अंडरग्रेजुएट


गजानन दूबे

पापा ने सिलवा दिये चार कोट छः पैन्ट,
'राजू बेट्टा बन गया कॉलेज स्टूडेन्ट।'

कॉलेज स्टूडेन्ट हुए हॉस्टल में भर्ती,
दिन भर खायें चाट-पकौड़े, शाम को चरें बर्फी।

आधा दर्जन ले लिया जीन्स और दो दर्जन टी-शर्ट,
कोट-पैन्ट से होता था, महफिल में इनसल्ट।

सिगरेट पीना सीख लिया और खरीद लिया मोबाइल,
अपनी बॉडी में घोल लिया, रित्तिक टाइप स्टाइल।

पॉलिश, सेविंग, सेंट, चश्मा और तेल जुल्फों में डाला,
बाइक लेकर निकल लिये, लगाकर कमरे में ताला।

फिल्म, यार-दोस्त, महिला मित्रों के शौकीन,
बायें हाथ में लिए मोबाइल, कैफों में खा चाउमीन।

कुछ लोगों ने दिया नसीहत, पढ़ लो कमरे में हो पैक,
सुनी एक ना और हुई फजीहत जब आया कम्पल्सरी बैक।

कम्पल्सरी बैक आया, क्योंकि नम्बर पाये साढ़े एक,
साल भर जो रहे चूसते मिल्क-बादाम और पेस्ट्री केक।

होते रहे दो साल तक, एक क्लास में फेल,
चीटिंग करते पकड़े गये, बन्द हो गये जेल।

प्रॉक्टर साहब कर दिये एक्जाम में उनको रिस्टीकेट,
नेक्स्ट इलेक्शन चुन गये भइया 'कॉलेज प्रेसीडेन्ट'।

(गजानन फिलहाल इलाहाबाद विश्वविद्यालय से वाणिज्य में शोध कर रहे हैं।)

पिरामिड














पिरामिड
अब भी बनते हैं
मिस्त्र में ही नहीं
दुनिया के हर कोने में,
कृत्रिमता (के लेप) में पुते
आदर्श बनते हैं ममी और-
दफना दिये जाते हैं,
एहसास, अनुराग और सच्चाई
जैसे रत्नों के साथ,
और फिर कब्र को उनके
छुपा लेता है एक-
बड़ा-सा पिरामिड।

विचार-धारा










मोहित मिश्रा

विचार-धारा
धान के बीज-सी होती है,
पड़ी रहकर
तर्क की जमीन पर
तोड़ती है आसमान को,
जड़ें बहुत गहरे
आस्था की मिट्टी में जमाती हैं,
यह आदमी की फितरत है
आदत है उसकी-
विश्वास करना और
आस्था रखना
किसी न किसी पर।

(मोहित फिलहाल आकाशवाणी इलाहाबाद से संबद्ध हैं.)

एक पिल्ले का मरना


एक दुबली पतली कुतिया ने एक खूबसूरत पिल्ले को जन्म दिया। कुछ दिनों बाद वह बिना पूछे ही लोगों के घरों में आने-जाने लगा। लोग उसे तूह...तूह...कह पुचकारते, दुलारते लेकिन दहलीज के भीतर जाते ही दुरदुरा देते। किसी बच्चे का दूध जूठा कर देने पर मां ने पास रखा अद्धा दे मारा, वह कें...कें....कें...करता अपनी मां के पास चला गया। कुतिया ने बहुत चूमा-चाटा लेकिन घाव गहरा हो गया।
अब लोग दूर से ही नाक पर रुमाल रख उसे मार-मार भगाने लगे, अगरबत्तियां जलाने लगे। अब कहीं भी ठहरने की जगह उसके पास नहीं थी, शायद इसीलिए सड़क पर बीचोबीच ही दुबक कर सो रहा। अगले दिन सुबह जमादार ने अपनी नाक पर पट्टी बांधकर उसे कूड़ेदान में फेंक दिया।

अंडरवियर पर ही निकल पड़े अमृत राय

मार्कण्डेय, वरिष्ठ हिन्दी कथाकार
(स्वर्गीय मार्कण्डेय जी ने अमृत राय पर एक संस्मरण लिखा था 'भाई अमृत रायः कुछ यादें', पेश हैं उसकी कुछ बानगी...)
अमृत राय ने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के अमरनाथ झा छात्रावास में रहकर एमए किया। शायद आज कई लोगों को लगे कि यह कोई खास बात नहीं है, लेकिन उस समय की परिस्थियों को देखते हुए यह बात सचमुच रेखांकित करने के योग्य है। तब के इलाहाबाद विश्वविद्यालय और एएन झा छात्रावास का नाम देश के संभ्रांत समाज से जुड़ा हुआ था। लोग आईसीएस बनने का सपना लेकर उसमें भर्ती होते थे। अंग्रेजियत का तो वहां बोलबाला था। भाषा ही नहीं वरन् रहन-सहन के विशेष स्तर के कारण उस छात्रावास में बड़े-बड़े अधिकारियों के पुत्र-कलत्र ही स्थान पाते थे, लेकिन अमृत भाई उसमें घुस ही नहीं गये वरन् एक छोटे से अण्डरवियर के ऊपर घुटने तक का नीचा कुर्ता पहनकर हॉस्टल से बाहर सड़क पर चाय पीने भी पहुंचने लगे। बताते हैं कि इस बात को लेकर पहले सख्त विरोध हुआ लेकिन अध्ययन और विशेषतः अंग्रेजी भाषा का सवाल आते ही लोग उनके सामने बगलें झांकने लगते थे। कहते हैं अमृत जी ने 'कैपिटल' को उसी समय बगल में दबाया और कुछ दिनों बाद तो वे लेनिन की पुस्तकें साथ लेकर विभाग भी जाने लगे।....

मजबूरी का नाम महात्मा गांधी !

(लोगों को अक्सर किसी हताशा भरे क्षण में यह कहते हुए सुना जा सकता है-'मजबूरी का नाम महात्मा गांधी'। जिस महान शख्सियत को हम अपना राष्ट्रपिता मानते हैं, बापू कहते हैं, ...सम्मान करते हैं, उन्हीं को मजबूरी का पर्याय बताना कितना गलत है ! 'म्योरियन' का अक्टूबर २००४ अंक गांधी जयन्ती के अवसर पर प्रकाशित हुआ था। इस मौके पर मैंने कुछ प्रबुद्धजनों से ये सवाल किया था कि आखिर क्या वजह है जो महात्मा गांधी के साथ एक बेतुका जुमला जुड़ा हुआ है- 'मजबूरी का नाम महात्मा गांधी'...लोगों के विचार कुछ यूं थे-)




डॉ राजेंद्र कुमार
, साहित्यकार एवं पूर्व विभागाध्यक्ष, हिन्दी विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय
''ये मुहावरा गांधीजी का अवमूल्यन करने वाला प्रतीत होता है। गांधीजी ने कभी भी अहिंसा को न तो कायरता का पर्याय माना न मजबूरी का। चूंकि गांधी के आदर्श को व्यवहारिकता के तौर पर नहीं समझा सका। इसलिए जिन लोगों ने वास्तविक रूप में गांधीजी की राह पर चलना चाहा उनको मजबूरी से जोड़कर लोगों ने अपनी समर्थता को छिपा लिया।''

डॉ जेएस माथुर, निदेशक, गांधी अध्ययन संस्थान, इलाहाबाद
'
''ये प्रश्न बिल्कुल बेतुका है। लोग किसी भी उल्टी-सीधी बात को स्लोगन बना लेते हैं, उस पर हमें माथा-पच्ची नहीं करनी चाहिए कि कैसे बना क्यों बना। गांधीजी दृढ़ इच्छाशक्ति और सबल नेतृत्व के स्वामी थे, लोग उनसे बहुत कुछ सीख सकते हैं।''

डॉ एचएस उपाध्याय, अध्यक्ष, दर्शनशास्र विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय
''गांधीजी हिंसा के सहारे इतने बड़े शक्तिशाली ब्रिटिश साम्राज्य से नहीं लड़ सकते थे। इसीलिए मजबूरी में अहिंसा का सहारा लेना पड़ा। शायद तभी लोग ऐसा कहते हैं।''

डॉ राजाराम यादव, प्राध्यापक भौतिकशास्त्र, इलाहाबाद विश्वविद्यालय
''गांधीजी देश का बंटवारा नहीं चाहते थे, पर मजबूरी में उन्हें यह स्वीकार करना पड़ा। शायद इसीलिए मजबूरी का नाम महात्मा गांधी पड़ गया।''

डॉ आईआर सिद्दिकी, प्राध्यापक रसायनशास्त्र, इलाहाबाद विश्वविद्यालय
''उस समय जनता तत्कालीन सरकार पर आर्थिक या राजनैतिक रूप से दबाव डालने में असमर्थ थी। गांधीजी मजबूर होकर खुद को तकलीफ देना उचित समझते थे। उनकी कार्यप्रणाली यही थी कि अधिक से अधिक कष्ट सहकर विरोध प्रदर्शित किया जाए।''

डॉ अनीता गोपेश, साहित्यकार एवं प्राध्यापक जन्तु विज्ञान, इलाहाबाद विश्वविद्यालय
''गांधीजी राष्ट्र का विभाजन नहीं चाहते थे फिर भी विभाजन हुआ और वे मजबूर हो अपना शोक प्रकट करते रहे। उनकी इस मजबूरी को ही उनका अवमूल्यन करते हुए लोगों ने उनके नाम के साथ जोड़ दिया, यह सर्वथा अनुचित है।''

डॉ अविनाश त्रिपाठी, व्याख्याता वनस्पति विज्ञान, इलाहाबाद
'' गांधीजी के संबंध में तीन बातें विचारणीय हैं-

  1. वे बहुत कृषकाय शरीर के थे।
  2. उन्होंने प्राय: मजबूरन ही अंग्रेजों से समझौते किये
  3. भारत के विभाजन के मुद्दे पर जिन्ना के हठ के आगे वे मजबूर हो गये।
दूसरे किसी भी शख्स ने कभी मजबूर होकर समझौते नहीं किये, इसीलिए मजबूरी का नाम महात्मा गांधी कहा जाता है...''

(.....इस कड़ी को आप आगे बढ़ा सकते हैं....लिखिए आप क्या सोचते हैं इस मुद्दे पर, क्यों अक्सर लोग कहते हैं 'मजबूरी का नाम महात्मा गांधी !' अपने विचार आप यहां टिप्पणी के रूप में भी दर्ज कर सकते हैं। )

अंतहीन संघर्ष













राहुल त्रिपाठी

शोषक करता है शोषण
शोषित सहता है शोषण
सीमा पार हो जाने पर
होता है 'संघर्ष', और-
शोषित बन जाता है शोषक
करने के लिए शोषण,
फिर होता है संघर्ष, और-
...एक अंतहीन प्रक्रिया चलती जाती है
संघर्ष की !

(राहुल फिलहाल इलाहाबाद विश्वविद्यालय में राजनीतिशास्त्र में शोधरत हैं और जेआरएफ पा रहे हैं.)

Sunday, June 15, 2008

मैं घास हूं !

हरीश कुमार सिंह

मैं घास हूं
झुकना मेरा धर्म है,
बड़े हो जाने पर काट दिया जाना
मेरा भाग्य है,
कोई पशु आता है रौंदता है और
उसी सीमा तक पहुंचा देता है
जहां से शुरु किया था मैंने,
खुले आकाश के नीचे बसेरा है मेरा
और बहती हवाओं से-
न जाने कितने जन्मों की दुश्मनी है मेरी,
तेज धूप का विरोध मैं
सूखकर प्रकट करती हूं,
तेज हवाओं का सामना करते
वीरगति प्राप्त होने पर,
मुसाफिरों को एक आनन्ददायक
आसरा देने के सौभाग्य पर
मेरा कतई कोई अधिकार नहीं है,
क्योंकि-
मैं घास हूं, झुकना ही मेरा धर्म है।

(हरीश आजकल भारत सरकार के केबिनेट सचिवालय में बतौर फील्ड अफसर काम कर रहे हैं।)

मध्यवर्गीय












मोहित
मिश्रा


अमूमन बिखर जाता हूं
जब तिनका-तिनका टूटता है कहीं
किसी चूहा दौड़ में
जीतकर पनीर का कोई टुकड़ा-
अपने भाग्य पर इठलाता हूं,
कभी-कभार चुरा लेता हूं-
किसी भूखे की रोटी, जान-बूझकर
और किसी कुत्ते की तरह
डंडे के आगे दुम हिलाता रहता हूं,
देखकर सामने होते किसी
बलात् कार्य को भी-
मैं नि:शंक सो जाता हूं,
या फिर लिखकर कोई कविता
अपना खोखला आक्रोश
या दो बूंद घड़ियाली आंसू
उकेर लेता हूं,
............
मैं, हां मैं...
भारत का मध्य वर्गीय कहलाता हूं !

Friday, May 30, 2008

चुप्पी तोड़ो !












वतन
बिक जाय
चमन बिक जाय...
आओ इससे पहले ही-
एक बारुदी सुरंग बिछाकर
नीलामी रोक दी जाय !

Wednesday, May 28, 2008

छात्रा की चुभन













प्रीतेश रंजन राजुल
हर सुबह
पढ़ने के लिए और पढ़े जाने के लिए
(लोग मुझे पढ़ते हैं)
चाय की दुकान पर
बैठे मठाधीशों की,
तथाकथित भावी अधिकारियों की
गिद्ध-सी आंखों के बीच से
गुजरना पड़ता है मुझे,

मैं जुए में हारी हुई
द्रौपदी हूं, और-
गुजरना है मुझे
कौरवों के बीच से,
सबको चाहिए अपनी-अपनी पसंद,
लुभावनी और-
उनकी इस पसंद के
व्याख्यायित शब्द,
चुभते रहते हैं मेरे बंद कानों में
अनवरत..!

(यह कविता म्योरियन के अक्टूबर २००४ अंक में प्रकाशित हुई थी। राजुल सर उनमें से हैं जिन्हें अभिव्यक्ति के लिए माध्यम की जरुरत नहीं पड़ती, माध्यम उन्हें खुद-ब-खुद ढूंढ लेते हैं। )

बढ़ाओ हाथ...

बढाओ हाथ-उट्ठो-मत करो देरी,
मगर यह क्या-तुम्हारे भर गए लोचन
कमल कोमल उंगलियां मुड़ चलीं बेबस
अंगूठे भिंच गए सहसा
तुम्हारी मुट्टियां भी बांध दी आखिर
इन्हीं मजबूरियों ने-बस
मुझे अब कुछ नहीं कहना,
कहूं भी क्या
कि जब मजबूरियों के बीच ही रहना।

(यह कविता डॉ जगदीश गुप्त और डॉ रामस्वरुप चतुर्वेदी द्वारा संपादित पत्रिका नई कविता के पहले अंक-१९५४ में प्रकाशित हुई थी। इस पत्रिका के जरिए ही नई कविता लेखन के युग का सूत्रपात हुआ। डॉ जगदीश गुप्त हमारे ही हॉस्टल के अंत:वासी रहे। ३ अगस्त १९२४ को उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले में उनका जन्म हुआ। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एमए, डीफिल और साहित्य वाचस्पति की उपाधि धारण की। २६ मई २००१ को उनका देहान्त हो गया। उस ग्रेट म्योरियन, म्योर लीजेन्ड को शत शत नमन !....)