हमें कुछ ज्यादा नहीं बस इस परंपरा को ही बदलना होगा आखिर औवेशी से लेकर तोगडिया तक को जनाधार भी तो हम ही देते हैं।। भारत का विकास सिर्फ भारतीय कर सकते हैं धर्म के कुत्सित ठेकादार नहीं।स्पष्ट है आज राजनैतिक क्रांति की नही सामाजिक क्रांति की ज्यादा आवश्यकता है॥
Monday, December 29, 2014
हमें कुछ ज्यादा नहीं बस इस परंपरा को ही बदलना होगा आखिर औवेशी से लेकर तोगडिया तक को जनाधार भी तो हम ही देते हैं।। भारत का विकास सिर्फ भारतीय कर सकते हैं धर्म के कुत्सित ठेकादार नहीं।स्पष्ट है आज राजनैतिक क्रांति की नही सामाजिक क्रांति की ज्यादा आवश्यकता है॥
Posted by Akshay Bhatt at 10:31 AM 0 comments
"कर्म से राष्ट्रभक्त बनो और ह्रदय से मानवतावादी"अक्षय भट्ट
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Wednesday, November 13, 2013
Sunday, November 10, 2013
ये सपना आप भी देखिए !
सुबह उठा तो देखा कि भारत विकसित हो गया है । कल्लू दो रुपये प्रति पैमाना की दर से शैम्पेन वितरित कर रहा है फिर भी कोई भरपेट नहीँ निगल रहा है । युवक और युवतियाँ न्यूनतम परिधानोँ मेँ बड़े सलीके से शैम्पेन का लुफ्त उठा रहे हैँ । कोई किसी को घूर घूर कर देख नहीँ रहा है । ''जिया कुनैन रिजवी का खाली समय का सदुपयोग'' नामक व्याख्यान उटकमण्ड से सीधे टीवी पर प्रसारित हो रहा है । मेरे पूज्य पितामह के चौथे विवाह का जश्न चल रहा है और भावी पितामही अपनी आठवीँ शादी मेँ भी कयामत ढ़ा रही हैँ ।
भारतीयोँ द्वारा ब्रिटिश मजदूरोँ का शोषण आज भी एक वैश्विक मुद्दा बना हुआ है । भारतीय प्रधानमँत्री द्वारा अमेरिकी गरीबी और भूखमरी के अनुदान मेँ कटौती की सर्वत्र निँदा हो रही है ।
बच्चेँ महान अर्थशास्त्री लालू प्रसाद के ''तृण से ऊऋण'' के सिध्दाँत के विश्लेषण मेँ मग्न हैँ ।
रेलवे स्टेशन पर लोग केला और मूँगफली के छिलके नियत स्थान पर ही फेँक रहे हैँ । मूत्रालय और शौचालय का सही उपयोग करना लोग सीख गये हैँ । अब वहाँ भित्ति चित्र और भित्त आलेख का पूर्ण अभाव है । लोग न्यूतम वस्तुओँ के साथ यात्रा कर रहेँ ।
टैट सर अपनी ग्यारहोँ अँगुलियाँ फेस बुक के यज्ञ मेँ आहुति कर दिये हैँ तो शुक्ला सर अब अननोन लड़कियोँ को फ्रेण्ड रिक्वेस्ट भेजना बन्द कर दिये हैँ और सबसे बड़ी बात जिन्ना सर अब मेरा शहर राँची नामक पेज को अपडेट करना बन्द कर दिये हैँ ।
सरकार के ''अब न्यूनतम मेहनत करो'' नामक विधेयक का लोग विरोध कर रहेँ हैँ । कर्त्तव्यनिष्ठता सूचकाँक चौर सौ प्रतिशत तक बढ़ा हुआ है ।
अभूतपूर्व स्वतँत्रता संग्रामी सेनानी मुलायम सिँह की पुस्तक ''साम्प्रदायिक सौहार्द शिखर से शून्य की ओर'' को नोबुल समादृत किया गया है और प्रधानमँत्री मनमोहन को टाइम मैगजीन ने लगातार दसवेँ साल दुनिया का सबसे ताकतवर व्यक्ति घोषित किया । अखिलेश , राहुल और दिग्यविजय तीनोँ व्यावहारिक ज्ञान की पाठशाला मेँ प्रवेश ले चुके हैँ ।
संयुक्त राष्ट्र संघ ने महान समाज सेवक आशाराम को महिला और बाल विकास का ब्राण्ड अम्बेस्डर बना दिया है ।
महारानी सोनिया ने अपने 21वेँ जन्मदिन पर आस्ट्रेलिया को काँगेस से मुक्त करने की घोषणा की ।
भारत के सभी राज्योँ को समलैँगिक विवाह को मँजूरी मिली ।
जनसंख्या वृध्दि दर ऋणात्मक हो गयी है और सरकार ''अधिक बच्चे उपजाओ और लैपटाप मुफ़्त पाओ'' नामक अभियान चला रही है ।
जातिवाद , क्षेत्रवाद और साम्प्रदायिकता खोजने पर भी नहीँ मिल रही है । संयुक्त राष्ट्र संघ मेँ हिन्दी को वैश्विक भाषा और रुपये को वैश्विक मुद्रा का दर्जा मिल गया है ।
अतीक अहमद भारोत्तोलन मेँ स्वर्ण तो मुख्तार भाई ने निशानेबाजी मेँ तीन स्वर्ण लपक कर देश का गौरव बढ़ाया । मिस यूनिवर्स का ताज भारत सुन्दरी मायावती कृशाँगी को मिला ।
बाबा रामदेव ने हँसना बन्द कर दिया । आयोग परीक्षा की आयुसीमा चालीस से घटा कर साठ कर दिया है और प्रश्नपत्र मेँ नये प्रश्नोँ का भरमार है । विपिन सर के प्रतिभा का आयोग ने लोहा मान ही लिया और उन्हे लौह प्रतियोगी के सम्मान से नवाजा है अब वे शायद परीक्षा न दे । खुशी के इस क्षण मेँ विपिन सर ने एस आर वाई सर को चार बीड़ा पान और किताब कभी न खोलने की शपथ भी दिलायी है ।
मै आज चार नौकरियोँ के लिए त्यागपत्र लिख रहा हूँ । बगल वाले कमरे मेँ लैपटाप पर कुछ अजीब चीखने चिल्लाने की आवाज आ रही है शायद दँगे पर बनी कोई फिल्म बच्चे देख रहेँ हैँ ।
अरे ये क्या ? पछवाड़े पर एक जोरदार लात । साले गदहा बेँच कर सो रहे हो । नीँद खुल गयी । पिता जी के हाथोँ मेँ अखबार और आर ओ परीक्षा रद्द मुख्य समाचार ।
- (ए एन झा छात्रावास में मेरे सहपाठी अजय कुमार झा के फेसबुक वॉल से साभार)
Posted by मिथिलेश श्रीवास्तव at 12:19 PM 0 comments
Saturday, December 6, 2008
बारिश की बूंदें

- धनंजय मिश्रा
पत्तियों से लटकी बारिश की बूंदें
और उन पर पड़ती बल्ब की रोशनी रंगीन
नियति और पुरुषार्थ का संगम
प्रकृति और कृत्रिमता का संगम
सुंदर लगते हैं....
प्यारे लगते हैं...
पर डर लगता है
कहीं ये कृत्रिमता प्रकृति पर
और ये पुरुषार्थ नियति पर
हावी ना हो जाए...
कहीं रोशनी के भार से
बारिश की बूदें गिर ना जाएं....
Posted by मिथिलेश श्रीवास्तव at 10:08 AM 0 comments
ग़मज़दा हैं ज़िंदगी से...
पेश हैं अजय शुक्ला 'जुल्मी' की दो ग़ज़लें
१.
तंग आ चुके हैं कस-म-कस -ऐ जिन्दगी से हम
ठुकरा न दें इस जहाँ को कहीं बेदिली से हम
लो आज हमने तोड़ लिया रिश्ता-ऐ- उम्मीद
लो अब गिला न करेंगे किसी से हम
एक बार उभारेंगे अभी दिल के वल- वले
गो दब गए हैं भर-ऐ-गम-ऐ-जिन्दगी से हम
गर जिन्दगी में मिल गए फिर इत्तफाक से
पूछेंगे अपना हाल तेरी बेबसी से हम
हम गम-जदा हैं लायें कहाँ से खुशी के गीत
देंगे वही जो पायेंगे इस जिन्दगी से हम ...
२-
आज एक बार सबसे मुस्करा के बात करो
बिताये हुये पलों को साथ साथ याद करो
क्या पता कल चेहरे को मुस्कुराना
और दिमाग को पुराने पल याद हो ना हो
आज एक बार फ़िर पुरानी बातो मे खो जाओ
आज एक बार फ़िर पुरानी यादो मे डूब जाओ
क्या पता कल ये बाते
और ये यादें हो ना हो
आज एक बार मन्दिर हो आओ
पूजा कर के प्रसाद भी चढाओ
क्या पता कल के कलयुग मे
भगवान पर लोगों की श्रद्धा हो ना हो
बारीश मे आज खुब भीगो
झुम झुम के बचपन की तरह नाचो
क्या पता बीते हुये बचपन की तरह
कल ये बारीश भी हो ना हो
आज हर काम खूब दिल लगा कर करो
उसे तय समय से पहले पुरा करो
क्या पता आज की तरह
कल बाजुओं मे ताकत हो ना हो
आज एक बार चैन की नींद सो जाओ
आज कोई अच्छा सा सपना भी देखो
क्या पता कल जिन्दगी मे चैन
और आखों मे कोई सपना हो ना हो
क्या पता
कल हो ना हो ....
Posted by मिथिलेश श्रीवास्तव at 9:57 AM 0 comments
Saturday, July 5, 2008
घर से दूर...बहुत दूर...!

मैं कदम पर कदम बढ़ाता रहा और,
पीछे छूटते मील के पत्थरों की कतारों ने
नहीं होने दिया ये महसूस कि-
घर से बहुत दूर निकल आया हूं,
यहां नई दुनिया के नए लोग हैं जो,
शहर के बीचोबीच सवाल करते हैं कि-
'तुम यहां तक पहुंचे कैसे?'
क्या कहूं?
कहां से दूं जवाब?
जवाब तो मैं छोड़ आया था
अपने घर पर उसी वक्त,
जब मैंने आते समय मां का पैर छुआ था...!
Posted by मिथिलेश श्रीवास्तव at 8:45 PM 0 comments
